Tuesday, September 30, 2014

कोई कहदो जाके उनसे

ज़रा संभल कर अदाएं दिखाएं

वो पलकें उठतीं हैं वहां

और यहां क़त्ल-ऐ-आम हो जाता है !!

तारीफ़ उसकी 


कहा उसने की तारीफ करो मेरी कुछ इसकदर

शमा भी शर्माजाए अपनी अदाओं पर

मैंने कहा क्या करूं  मैं तारीफ तेरी

तेरे मुज्जस्सिम के सामने तो ख़ुदा भी लाज़वाब हो गया !!


शेहेर में मरीज़-ऐ -इश्क़ बढ़ गए

मैखानो में हम्प्याले ,

सूरत-ऐ-यार ज़रा जो बेनक़ाब हो गया !!


न बैद , न हाकिम , न दवा , न दुआ

कुछ और काम आया

 बस तुझसे नज़रें मिलीं और दिल लाइलाज हो गया !!


Copyright (C) Asit Ranjan Panigrahi 2014.

Monday, September 29, 2014

कभी फुर्सत मिले तो,

रात को छत पे हो आना 

बड़ा गुमान है चांद को ,

अपनी ख़ूबसूरती पे 

बड़ा इंतज़ार है हमें ,

उसका गुरूर टूटने का !!
तू आँखों से मत छू मेरे दिल के फ़साने को 


कहीं कोई किस्सा तेरी आँखों में आंसूं न देजाए !!
यादों की मजारें 


कोरे कागज़ सा हो चूका हूं 

एहसास नहीं उठते दिल में 

कुछ कहना चाहूं  भी तो ,

अल्फ़ाज़ कतराते हैं मुझसे 

कभी गुनगुनाता था तन्हाई में जिन्हें 

याद तो आते हैं मगर 

कैद नहीं कर पाता  श्याही में उन्हें 

बस बैठा ताकता रहता हूं 

मेज़ पर पड़े सादे कागज़ को 

कोई पूछे तो कह्देता हूं 

नज़्म जो हुआ करते थे कभी 

आज बस यादों की मजारें हैं !!


Copyright (C) Asit Ranjan Panigrahi 2013

यह तेरी हुकूमत



क्यों छोड़चाला तू बस्ती को

क्यों मुंह मोड़ लिया हक़ीक़त से

सुनले के दर्द सा उठता है

तू कहता है सब ठीक है मगर

येः धुआं फिर क्यों उठता है !!


वो बीज जो तूने बोए थे

वो फसलें थी सब नफरत की

आ देख के उनकी लपटों से

खेत येः बंजर बनता है

तू कहता है सब ठीक है मगर

येः धुआं फिर क्यों उठता है !!


कभी किसीका घर तोड़ कर 

क्या राम वहां पर रहता है 

तूने बांटे इंसानो को 

फिर मस्जिद का नाम क्यों लेता है 

तू कहता है सब ठीक है मगर

येः धुआं फिर क्यों उठता है !!


मेरी रोटियां बेच कर 

महल अपने बनवाता है 

सपनो से भी कतराता हूँ 

सपना भी महंगा होता है 

तू कहता है सब ठीक है मगर

येः धुआं फिर क्यों उठता है !!


क्या आसमान फट पड़ा था 

जब मैंने दिल की कही थी 

क्यों अधि रात, मेरे हक़ पे लाठियां बरसाता है 

तू कहता है सब ठीक है मगर

येः धुआं फिर क्यों उठता है !!


येः नासूर का दर्द है मेरा 

तू बातों से क्यों सहलाता है 

आ देख के चूल्हा भूका है 

वादों से क्यों फुसलाता है 

ग़ुलामी वो अच्छी तेरे हुकूमत से 

हर साँस चीख़ यह कहता है 

तू कहता है सब ठीक है फिरभी 

येः धुआं इसलिये उठता है

येः धुआं इसलिये उठता है !!


Copyright (C) Asit Ranjan Panigrahi 2013

पछतावा

लो फिर से अनसुनी सी रहगयी 

कहानी मेरी 

लो फिर से अनसुना सा मेरा 

फ़साना रहगया 

बड़ी उम्मीद से दिन की शुरुवात की थी हमने 

कोरे कागज़ सा दिन का अफसाना रहगया 

हर एक कोने को टटोला था  मैंने 

पर हर साज़ ;

हर तराना ;

अधुरा रहगया 

ग़म आसुओं के पते पर अब मिलते नहीं 

उनका ठिकाना कुछ और होगया 

ज़िन्दगी बेवक्त अब सताने लगी 

उससे रिश्ता जो कुछ अनजाना  सा होगया 

अब तो कागज़ भी कतराते हैं 

अल्फाजों से मेरे 

शक्ल-ए-तसब्बुर कुछ  ऐसा बनगया 

बैठा रहा हूँ अब बस,

इन चार दिवारी के अन्दर 

सोचता रहता हूँ बस यही एक बात 

यह क्या होगया 

यह  होगया