Wednesday, April 6, 2016

आज   तो  एहसास   नहीं   उतरते   कागज़   पर  

तेरा  गम   शायद   अब   हल्का  हो  चला  है  



पहले   तेरी   याद   ही   काफी   थी   गिरिया   के   आमद   के  लिए 

आज  शिकन  भी  नहीं  चेहरे  पे,  तेरा   ज़िक्र  हो  चला  है  




दिन गुज़र जाता है मग़र करार नहीं मिलता 
इस भीड़ में कोई चेहरा तेरे चेहरे से नहीं मिलता 


आईना भी मायूश खड़ा है आज 
मेरे अक्स से जो मेरा चेहरा नहीं मिलता 


कभी जो हुआ करते थे रौनक- ए - महफ़िल हमारे 
आज यादों में भी उनका साया नहीं मिलता 


कहते थे ज़िन्दगी जिन निगाहों को कभी 
आज उस चेहरे का कहीं दीदार नहीं मिलता 


ज़िन्दगी है, सांसें हैं, जी रहे हैं 
बस कभी चैन नहीं मिलता, कभी करार नहीं मिलता 


आशित ये खाव्ब फरेबी हैं इतना जानले 
कभी ये तुझे नहीं मिलते, कभी तू इनको नहीं मिलता 




ग़म - ए - इश्क़ , हाल - ए  - दिल , बज़्म- ए  - यार मैं कैसे कहूं 


कहने को तो बहुत है, पर मालूम नहीं कैसे कहूं 
 वो रात लिये  फिरते हैं पहलू  में 


मैं दिन की तलाश में भटका करता हूं 
जिन्हे भूलने में हमे ज़माने लगे 

वो यादों में हमें आज़माने लगे 
वो तेरा  बेबाकी से कहना 
वो मेरा दिल्लगी से सुनना 


बहत याद आता है हमे 
वो बेमतलब की बातें सुनना 


 फ़साने सुनाएंगी बहत सी हमारी 
कभी फुर्सत में इन दर-ओ-दीवारों  को सुनना 


आ जाओ लौट कर, ख़ामोश हो जाएं  सभी 
बस बहत हो गया ज़माने के ताने सुनना 


समझ नहीं पाते पागल कहते मुझे 
अखडता है इन्हें  मेरा बज़्म में ख़ामोशी सुनना 


रात अकेले  चांद  के साथ गुज़ारता हूं 
अच्छा लगता है तन्हाई में तन्हाई को सुनना 


बड़े दिनों बाद मिले और ख़ामोश हो आशित 
बड़ी बुरी आदत है ये, ना अपनी कहना, ना मेरी सुनना 


-------------------------------


तू आदमी है पहले इंसान बन 
फिर ख़ुदा और मज़हब  बात करना 


देखि हैं कई सियासतें , देखि हैं कई हुकूमतें 
तू पहले मेरी सुन, फिर अपनी  बात करना 


किसने दिया है  हक़ तुझे, क्यों बना है वाइज़ यहां 
पहले अपना घर बसा, फिर ज़माने की बात करना 


भैया सभी उल्झे हैं ज़िन्दगी के झमेलों में 
आज रोटी की करले, कल मज़हब की बात करना 


तू ना होगा तो क्या  मिलेगा नहीं नहीं खुदा मुझे 
तू अपनी मंज़िल ढूंढ फिर मेरे रस्ते की बात करना


खुदा नहीं मिलता कभी काबा में कभी काशी में 
खुदा की चाह है तो पहले इन्सानो की बात करना