Wednesday, April 6, 2016

जिन्हे भूलने में हमे ज़माने लगे 

वो यादों में हमें आज़माने लगे 
वो तेरा  बेबाकी से कहना 
वो मेरा दिल्लगी से सुनना 


बहत याद आता है हमे 
वो बेमतलब की बातें सुनना 


 फ़साने सुनाएंगी बहत सी हमारी 
कभी फुर्सत में इन दर-ओ-दीवारों  को सुनना 


आ जाओ लौट कर, ख़ामोश हो जाएं  सभी 
बस बहत हो गया ज़माने के ताने सुनना 


समझ नहीं पाते पागल कहते मुझे 
अखडता है इन्हें  मेरा बज़्म में ख़ामोशी सुनना 


रात अकेले  चांद  के साथ गुज़ारता हूं 
अच्छा लगता है तन्हाई में तन्हाई को सुनना 


बड़े दिनों बाद मिले और ख़ामोश हो आशित 
बड़ी बुरी आदत है ये, ना अपनी कहना, ना मेरी सुनना 


-------------------------------


तू आदमी है पहले इंसान बन 
फिर ख़ुदा और मज़हब  बात करना 


देखि हैं कई सियासतें , देखि हैं कई हुकूमतें 
तू पहले मेरी सुन, फिर अपनी  बात करना 


किसने दिया है  हक़ तुझे, क्यों बना है वाइज़ यहां 
पहले अपना घर बसा, फिर ज़माने की बात करना 


भैया सभी उल्झे हैं ज़िन्दगी के झमेलों में 
आज रोटी की करले, कल मज़हब की बात करना 


तू ना होगा तो क्या  मिलेगा नहीं नहीं खुदा मुझे 
तू अपनी मंज़िल ढूंढ फिर मेरे रस्ते की बात करना


खुदा नहीं मिलता कभी काबा में कभी काशी में 
खुदा की चाह है तो पहले इन्सानो की बात करना




Tuesday, October 14, 2014

मेरी दौलत की कुछ यूं नुमाइश हुई

हर कोई आके मेरा दिल  लूट गया ......................... 
यह दुनिया है.... 

दिन बदलता है, रात बदलती है ,

लोग बदलते हैं, रिश्ता बदलता है 

यह दुनिया है मेरे प्यारे,

यह दुनिया है 

कभी शीतल छाओं है 

कभी निर्मम ज्वाला है 

न जानो तो अमृत है 

जान गए तो विष का प्याला है।। 

Sunday, October 5, 2014

दुश्मनी ख़ुदा से



कुछ यूँ ख़ुदा से मैं दुश्मनी निभाता हूँ 

सजदे में सर झुकता है, फरियाद न कोई करता हूं।।


तोड़ता है दिल मेरा बार बार रुलाने  लिए 

मैं हरबार गम को हंसकर सिने से लगाता हूं ।।


ठुकराई है मेरी मिन्नतें ज़िन्दगी भर 

मैं उसी के दर पे, उसकी बेरहमी गिनाता हूं ।।


अब तो साफ़ हो चाला है रिश्ता हमारा 

वो अपनी खुदाई दिखाता है, मैं इंसानियत दिखाता हूं ।।


मुक़ाबला दोनों में है बराबर का अबतक, देखते हैं 

पहले वो हार मानता है, या मैं हार मानता हूं ।।



Copyright (C) Asit Ranjan Panigrahi 2014.


Saturday, October 4, 2014

महंगा हुआ मेरा ग़म



शराब भी न खरीद सकी, गम कुछ यूँ महंगा हो गया

हाथ में पैमाना उठाया हुआ था, आंसू है के छलक गया।।


महफ़िल में वो मिले,  और मुंह फेर लिए हमसे

चलो आज की रात नए गम का  बहाना हो गया ।।


बेमानी सी चंद सांसें बची है अब इस दिल में

मगर अपना तो जहान में सफर ही पूरा हो गया ।।


वो करते रहते हैं आज भी वफ़ा के वादे

कोई कहदो उन्हें, येः झूट अब पुराना हो गया ।।


दर्द तूने दिए हैं रब मुझे, हर दर्द के ऊपर

कभी लगा न होगा तुझे, के कुछ ज्यादा हो गया ?



Copyright (C) Asit Ranajn Panigrahi 2014.