Wednesday, April 6, 2016









तू मुनफ़रिद यक्ता है मैं मानता हूं 
उसके फितरत का करिश्मा है मानता हूँ 


इंतहा-ए -इश्क़ का सम्त है तू 
तेरे शखावत का मुंतज़िर हूं मानता हूं 


जो शहर सारा दीवाना हुआ बैठा है 
उस मग़रूर -ए - यार को जानता हूं 


बहत बेबाक हैं तेरे निगाहों के खनजर 
मैं मौत को तैयार, ये मानता हूं  


वो कहते हासिल-ए -महताब है नामुमकिन 
पर हारने से मैं कहां  मानता हूं 


तू पाक है आब -ए -अब्र की तरह 
मैं खाक हूं ज़मीन हूं मानता हूं 


गोया वस्ल है मुश्किल लोग कहते 
तू भी बेरुख मुझसे, ये भी मानता हूं 



तू यकीन में है अपने दिल की मगर 
मैं एजाज़ - ए  - शिद्दत - ए  - मोहब्बत मानता  हूं  





फिर से वही दास्तां - ए - यार आ गया
बेबाकी से ज़ुबां पे तेरा नाम आ गया


हुनर-वर ना  इतने के हम सहलें
याद के साथ जो ये अजाब आ गया


बड़ा वीरान सा लग रहा है ये मकान हमें
लौट कर आए तो लगा किसीका  मज़ार आ गया




आज   तो  एहसास   नहीं   उतरते   कागज़   पर  

तेरा  गम   शायद   अब   हल्का  हो  चला  है  



पहले   तेरी   याद   ही   काफी   थी   गिरिया   के   आमद   के  लिए 

आज  शिकन  भी  नहीं  चेहरे  पे,  तेरा   ज़िक्र  हो  चला  है  




दिन गुज़र जाता है मग़र करार नहीं मिलता 
इस भीड़ में कोई चेहरा तेरे चेहरे से नहीं मिलता 


आईना भी मायूश खड़ा है आज 
मेरे अक्स से जो मेरा चेहरा नहीं मिलता 


कभी जो हुआ करते थे रौनक- ए - महफ़िल हमारे 
आज यादों में भी उनका साया नहीं मिलता 


कहते थे ज़िन्दगी जिन निगाहों को कभी 
आज उस चेहरे का कहीं दीदार नहीं मिलता 


ज़िन्दगी है, सांसें हैं, जी रहे हैं 
बस कभी चैन नहीं मिलता, कभी करार नहीं मिलता 


आशित ये खाव्ब फरेबी हैं इतना जानले 
कभी ये तुझे नहीं मिलते, कभी तू इनको नहीं मिलता 




ग़म - ए - इश्क़ , हाल - ए  - दिल , बज़्म- ए  - यार मैं कैसे कहूं 


कहने को तो बहुत है, पर मालूम नहीं कैसे कहूं 
 वो रात लिये  फिरते हैं पहलू  में 


मैं दिन की तलाश में भटका करता हूं 
जिन्हे भूलने में हमे ज़माने लगे 

वो यादों में हमें आज़माने लगे